विष्णुगाड जल विद्युत परियोजना ने सभी नियम कानूनों को ताक पर रखकर पतित पावनी अलकनंदा नदी को बना दिया डंपिंग जोन
-टीएचडीसी के डंपिंग मलवे से 2023 में छोटी काशी हाट गांव का शिव मंदिर बह गया है। अब कंपनी ने शिव मंदिर बनाना तो दूर गदेरे में मकिंग डालकर शिव मंदिर में बचे शिवलिंग को भी बहाने की पूरी योजना बना दी है, ऐसे में लोगों में आक्रोश
चमोली । टीएचडीसी की विष्णुगाड पीपलकोटी परियोजना में कंपनी द्वारा सभी नियमों को ताक पर रख कर परियोजना निर्माण का कार्य किया जा रहा है। जिससे पतित पावनी अलकनंदा नदी का पानी दूषित होने के साथ ही एक बड़ी आपदा को न्योता दिया जा रहा है।
टिहरी हाइड्रो डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन द्वारा विष्णुगाड जल विद्युत परियोजना पीपलकोटी 444 मेगावाट का निर्माण कार्य किया जा रहा है। कंपनी ने परियोजना निर्माण ने निकलने वाले मकिंग (मिट्टी) को डंपिंग के लिए छोटी काशी हाट गांव को विस्थापित किया गया था। लेकिन आधा – अधूरी विस्थापन के खिलाफ ग्रामीणों द्वारा कानूनी लड़ाई लड़ी गई और अब हाईकोर्ट ने हाट गांव में मंकिग पर रोक लगाई गई है। जिसके चलते टीएचडीसी के पास कहीं भी डंपिंग जोन नहीं है। तब कंपनी द्वारा सभी नियम कानूनों को ताक पर रख कर नदी नालों के साथ अब पतित पावनी अलकनंदा नदी को ही डंपिंग जोन बना दिया है। कंपनी द्वारा बिरही में अलकनंदा नदी के किनारे मंकिग डाली जा रही है। जो भविष्य में बड़ी आपदा को न्योता दे रही है। जिसमें परियोजना प्रभावितों में कंपनी के खिलाफ आक्रोश बना हुआ है। पूर्व में भी कंपनी द्वारा एनजीटी के सभी नियमों को धत्ता देकर सड़क निर्माण कार्य में निकलने लगी मिट्टी को अलकनंदा नदी में प्रवाहित किया गया। तब एनजीटी द्वारा टीएचडीसी पर लगभग 42 लाख का जुर्माना लगाया गया। बावजूद कंपनी ने इससे सबक नहीं लिया गया। और अब अलकनंदा नदी के किनारे डंपिंग जोन बना दिया है। जो भविष्य में पर्यावरणीय नुक्सान के साथ विनाशकारी आपदा ला सकती है। वहीं पूर्व ग्राम प्रधान छोटी काशी हाट राजेन्द्र हटवाल ने आरोप लगाया कि टीएचडीसी परियोजना द्वारा सभी नियम कानून को ताक में रखकर निर्माण कार्य किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि परियोजना लगातार राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण के नियमों की धज्जियां उड़ा रही है और प्रशासन मौन बैठा हुआ है। ग्राम सभा हाट के निकट छमगाढ गदरे में जो कि बरसाती नाला है बरसात में बहुत पानी आता है परियोजना प्रबंधन ने बीच नाले में आरसीसी दीवार लगाकर लाखों टन सुरंग का मलबा डंप किया है, वहीं आजतक लाखों टन बरसात मलबा अलकनंदा नदी में बह चुका है और थोड़ी बरसात आएगी फिर मलबा बहेगा , नदियों में कैमिकल युक्त मलबा और पानी जाने के कारण नदियों का पारिस्थितिक तंत्र विलुप्त होने के कगार पर है। 2023 में क्षेत्र में बहुत अत्यधिक अतिवृष्टि होने की कारण पौराणिक शिव मंदिर बह गया था, ध्यान रहे कि अलकनंदा गंगा नदी की सबसे बड़ी सहायक नदी है और गंगा बेसिन अंतर्गत आती है ऐसे में एनजीटी भी मूक दर्शक बन कर खड़ी है। इस संवेदनशील मुद्दे पर एनजीटी को परियोजना पर शख्त कार्यवाही कर तत्काल रोक लगानी चाहिए।
आपदा की आशंका
अलकनंदा नदी को डंपिंग जोन बनाने से भविष्य में बड़ी आपदाओं का खतरा बढ़ गया है, क्योंकि निर्माण मलबे और अत्यधिक कचरे से नदी का प्राकृतिक प्रवाह बाधित हो रहा है, भूस्खलन की संभावना बढ़ रही है और नदी के पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान हो रहा है, जिससे 2013 जैसी भयानक बाढ़ और भूस्खलन का जोखिम कई गुना बढ़ सकता है। नदी संकुचित हो रही है और भूस्खलन के लिए संवेदनशील हो गई है। प्राकृतिक आपदा जैसे 1893, 1970 बेलाकुची दुर्मी ताल से हुए नुक्सान की आशंका है।
पर्यावरणीय प्रभाव
नदी का पानी प्रदूषित हो रहा है, जलीय जीवन खतरे में है, और भविष्य में पीने लायक पानी मिलना भी मुश्किल हो सकता है।
एनजीटी की चिंता
राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी ) ने 2013 की बाढ़ को ‘भगवान का काम’ मानने से इनकार करते हुए कंपनियों पर कार्रवाई की थी और मलबे के निपटान (muck disposal) के लिए सख्त नियम बनाए थे, लेकिन उनका पालन नहीं हो रहा है।
मानव निर्मित आपदा
विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति मानव निर्मित है और भविष्य में बड़ी तबाही का कारण बन सकती है, जिससे स्थानीय लोगों में आक्रोश है।

