चमोली। उत्तराखंड राज्य आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने के बावजूद चिन्हीकरण से वंचित रह गए वास्तविक एवं पात्र आंदोलनकारियों को न्याय दिलाने की मांग तेज हो गई है। सोमवार को आंदोलनकारियों ने जिलाधिकारी चमोली को मांगपत्र सौंपकर छूटे हुए मामलों की विशेष जांच और पुनः परीक्षण किए जाने की मांग उठाई।
मांगपत्र में कहा गया कि उत्तराखंड राज्य निर्माण के लिए हजारों माताओं, बहनों, युवाओं और बुजुर्गों ने संघर्ष किया। अनेक आंदोलनकारियों को गिरफ्तारी, मुकदमों, पुलिस कार्रवाई और अन्य कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। इसके बावजूद विभिन्न कारणों से कई वास्तविक आंदोलनकारी आज भी चिन्हीकरण और राज्य आंदोलनकारी प्रमाण-पत्र से वंचित हैं।
आंदोलनकारियों ने मांग की कि चिन्हीकरण की प्रक्रिया को केवल सरकारी अभिलेखों तक सीमित न रखा जाए। आंदोलन के दौरान प्रकाशित समाचार-पत्रों की कटिंग, पूर्व में चिन्हित आंदोलनकारियों की गवाही, फोटो, पत्र-पर्चे, गिरफ्तारी व मुकदमे के अभिलेख, पुलिस कार्रवाई, जेल रिकॉर्ड, चिकित्सकीय दस्तावेज तथा आंदोलनकारी संगठनों के अभिलेखों को भी साक्ष्य के रूप में स्वीकार किया जाए।
इसके अलावा पुराने प्रमाण-पत्रों में दर्ज नाम, पिता के नाम, गांव अथवा अन्य दस्तावेजों में हुई त्रुटियों को संशोधित करने तथा पूर्व में लंबित या किसी कारण से छूटे मामलों का उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर पुनः परीक्षण करने की मांग की गई।
आंदोलनकारियों ने कहा कि यह किसी व्यक्ति विशेष का मामला नहीं, बल्कि राज्य निर्माण आंदोलन में योगदान देने वाले वास्तविक आंदोलनकारियों के सम्मान, अधिकार और न्याय से जुड़ा विषय है। उन्होंने कहा कि आंदोलनकारियों का सम्मान केवल प्रमाण-पत्र देने तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि उनके संघर्ष और योगदान को इतिहास में भी उचित स्थान मिलना चाहिए।
ज्ञापन देने वालों में जिला स्तरीय आंदोलनकारी चिह्नकरण समिति के सदस्य एवं पूर्व प्रमुख नंदन सिंह बिष्ट, आंदोलनकारी अतुल शाह, कुलदीप वर्मा, भारत सिंह, राघवेंद्र वर्मा, मोहन सिंह नेगी, श्रीवास्तव, पूर्व जिला पंचायत सदस्य देवेंद्र सिंह नेगी, हरीश पुरोहित सहित कई आंदोलनकारी मौजूद रहे।

